गरियाबंद /राजिम/ सतनामी समाज के गौरवशाली इतिहास में गुरु घासीदास जी द्वारा स्थापित सत्य, अहिंसा और समानता की परंपरा को आगे बढ़ाने में उनके वंशजों और अनुयायियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी परंपरा में गुरु बालक दास जी का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनके साथ सेवा और सुरक्षा में सदैव समर्पित रहने वाले अंगरक्षक सरहा जोधाई जी का जीवन त्याग, निष्ठा और गुरु भक्ति का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।
सरहा जोधाई जी केवल एक अंगरक्षक नहीं थे, बल्कि वे गुरु बालक दास जी के प्रति अटूट श्रद्धा रखने वाले सेवक थे। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण गुरु सेवा में समर्पित कर दिया। उस समय सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण थीं, और गुरु बालक दास जी को अपने विचारों के कारण कई विरोधों का सामना करना पड़ता था। ऐसे कठिन समय में सरहा जोधाई जी ने अपनी जान की परवाह किए बिना गुरु जी की रक्षा की और हर परिस्थिति में उनके साथ अडिग खड़े रहे।
सरहा जोधाई जी का जीवन यह दर्शाता है कि सच्ची सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक साधना है। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि गुरु के प्रति समर्पण और समाज के प्रति जिम्मेदारी ही व्यक्ति को महान बनाती है। उनका अनुशासन, साहस और त्याग आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
आज के दौर में, जब समाज को आदर्श व्यक्तित्वों की आवश्यकता है, सरहा जोधाई जी का जीवन हमें निष्ठा, समर्पण और सेवा के मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है। उनका योगदान सतनामी समाज के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।
निष्कर्षतः, सरहा जोधाई जी की गुरु सेवा एक ऐसी अमर गाथा है, जो हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और निस्वार्थ सेवा के माध्यम से ही समाज और मानवता का कल्याण संभव है।
भागचंद चतुर्वेदी
एम ए हिंदी साहित्य, राजनीति विज्ञान बीजेएमसी (पत्रकारिता)राज्यपाल शिक्षक सम्मान से पुरस्कृत शिक्षक
राजिम (गरियाबंद) मो 9755857964

